Hindi Story Love

Hindi Story on Love | प्रेमकथा – प्यार निस्संदेह इस दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज है। प्यार के बंधन के बारे में अंदाजा लगाने के लिए इस कहानी को पढ़ें।

आम तौर पर वट सावित्री पर्व हो या करवाचौथ या तीज पर्व हो, महिला अपने पति के प्रति अपने प्रेम और उनकी लंबी आयु की कामना के साथ उपवास रखती हैं. पति भी कई मौके पर अपनी पत्नी से प्रेम का इजहार करते हैं, लेकिन सिकंद्राबाद में एक ऐसे पति भी हैं जिन्होंने अपनी पत्नी से प्रेम का इजहार करने के लिए न केवल एक अनूठा प्रण लिया बल्कि, अंत तक उनका साथ भी न छोड़ा।
हमारा देश 2021 में कोरोना महामारी का सामना कर रहा था। दूसरी वेव के कारण कई लोगो ने अपने प्रियजनों को खोया। ऐसा समय था जब कुच्छ पति अपनी पत्नी के मृत देह के पास तक नहीं जा रहे थे। इतना भयानक समय था कि परिवार वालों ने ही अपनो का साथ छोर दिया था। पूरे देश में त्राही त्राही हो रही थी। और उस समय भी कुच्छ बेशर्म नेता मृतकों की चिता पर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेक रहें थे।

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ऐसे भयंकर समय में, एक वृद्ध जोड़ें को देखा। लगभग 60 के करीब वो बुज़ुर्ग थे, और 58 के करीब उनकी धर्मपत्नी। नाम पूरन दत्त शर्मा, और बीवी का कमलेश शर्मा।
बात करने पर पता चला कि सुबह अचानक से कमलेश जी को साँस लेने में तकलीफ़ हुई, और उनके बच्चे उन्हें उस अस्पताल में इलाज़ हेतु ले आए। दिन भर इलाज़ चला, पर खास असर हुआ नहीं, और देखते ही देखते रात हो गई।

अस्पताल मे रुकने की इजाज़त न होने के कारण सभी का कमलेश जी को छोड़ कर जाना पड़ा। घर पहुँचे सब। बच्चे तो अपने कमरों में चले गए, परंतु पूरन जी को नींद न आये। आय भी कैसे उनकी धर्मपत्नी जो अस्पताल में भर्ती थी। रात भर वे बेचैन रहें, आँखे बंद करे तो कमलेश जी का वो रुआँसा चेहरा बारबार आँखों के सामने आए, और पूरन जी सूर्य को कोसे की कब वो निकले कब वे अपनी पत्नी के पास जाए। उनसे जब रहा नहीं गया तो उन्होंने अपनी पत्नी को फ़ोन किआ, परंतु फ़ोन उन्होंने उठाया नही, पूरन जी ने सोचा शायद सो गई होंगी, अब कल ही मिलेंगें।

सुबह होते ही वे सबसे पहले तैयार हो गए। और अपने बच्चों के जागने का इंतजार करने लगें। नाश्ता करके वे अस्पताल की ओर निकल गए। वहाँ जाकर पता चला कि रात भर कमलेश जी ने ऑक्सिजन मास्क सही नहीं पहना, और जिदी बालकों की भांति परिवार के पास जाने की जिद करने लगी।

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जब पूरन जी अपनी बीवी से बात करने पहुँचे, तो उनकी बीवी उन्हें देखते ही फूट फूट कर रोने लगीं। केहती कि “मुझे छोड़ कर मत जाओ, मैं ठीक ना हूँ, ई कोई नर्स ना रखे ध्यान। मुझे घर ले चलो, मेरे बच्चों का खूब पैसा बर्बाद होरा।” और फिर खाँसने लगी। पूरन जी ने उन्हें शांत किआ, जूस के संग दवाई दी और उनके साथ ही बैठ गए।
नर्स ने बोला “अंकल जी आप यहाँ नहीं रुक सकते। प्लीज जाइये यहाँ से।”
उत्तर में वे बोले “बेटी मुझे रुकने दो, नही तो ये मास्क नहीं लगायेगी। कसम खाता हूं किसी को परेशानी नहीं होगी। मैं डॉक्टर साहब से भी इज़ाज़त ले लूंगा। अभी तो बैठने दो।” और ठीक हैं बोलकर नर्स चली गई। बेटे ने पूछा कि पापा आप यहाँ कैसे रहोगे? घर चलिये मम्मी का ध्यान रखने के लिए हैं सब यहाँ। परंतु वे नहीं माने और अपने बेटे को बड़ी समझदारी से अपनी बातों में उलझा कर घर भेज दिया, और बार बार अस्पताल आने से भी मना कर दिया, क्योंकि कोरोना होने का खतरा था। वे नहीं चाहते कि किसी भी कारण बच्चों को तकलीफ़ हो।

और उस दिन से पूरन जी ने अपनी बीवी की सेवा शुरू कर दी। 24 घंटे उनके साथ रहते, बेंच पर बैठे बैठे सो जाते, रूखी सुखी जैसी रोटी मिलती खा लेते। और अपनी पत्नी से इतनी बात करते जैसे पिछले 47 सालों से ऐसा मौका कभी मिला ही नहीं। वहीं अस्पताल में बैठे बैठे दोनों ने अपने साथ बिताए पुराने दिन याद कर लिए। और आगामी भविष्य की भी कुच्छ योजनाएं बना ली। कि कैसे अपनी धेवती की शादी करेंगे, अपने धेवते की नॉकरी का इंतज़ार करेंगे।

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3 4 दिन के इलाज के पश्चात डॉक्टरों ने थोड़ी उम्मीद बँधी कि ” हन्न वक्त लग सकता हैं, पर आप ठीक ज़रूर हो जाएंगी।” यह सुनकर कमलेश जी कि खुशी का ठिकाना ही न था। उन्होंने अपने पति से कह कर अपने सभी बच्चों से बात की। पोता पोती, धेवतो से धेवती से और बड़ी खुशी से सबको अपने स्वास्थ्य की जानकारी दी।
वहाँ तो कमलेश जी खुश थी, और दूसरी ओर पूरण जी दुःखी। ऐसा लग रहा था मानो, उनकी शक्ल का रंग ही उड़ गया। पर कमलेश जी के सामने माथे पर एक शिकन न लाते। शायद बात और थी, जो वे सबसे छुपाना चाहते थे।
देखते ही देखते दिन बीते और कमलेश जी की हालत बिगड़ती चली गई। सबसे बोलने वाली, खुश रहने वाली कमलेश अब एकदम चुप थी। और हर वक़्त नींद सी में रहती, शायद दवाई का असर। पर एक सवाल पूरण जी से रोज़ करती, “रजनी पापा, खाना खाया?” और वो हन्न कह देते। चाहें फ़िर खाया हो या नहीं।

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अकस्मात एक दिन, शाम को उनकी साँसे कम होने लगी। वे जोर जोर से साँस लेने की कोशिश तो करती पर शायद आराम न पड़ता उन्हें। यह देख कर पूरन जी की आँखों के आँसू रुक नहीं रहे थे। डॉक्टरों से बोलते “कैसे भी करके बेटा कोशिश करलो बचाने की।” और फिर एक कोने में हाथ जोड़ कर खड़े हो गए, मानो यम दूतो से निवेदन कर रहे कि उनके हमसफर को अभी न ले जाये।
परंतु नियति से बड़ा खिलाड़ी कौन? और उसे अपना खेल खेलने से रोके कैसे कोई? जिस सत्यवान ने अपनी सावित्री के प्राण बचाने की लाख कोशिश की वो उन कोशिशों में सफल न हुआ? और मन ही मन कहता, कोशिश करने वालो की भी कभी कभी हार हो ही जाती हैं!


रोते सुबकते उन्होंने अपनी पत्नी को आखरी बार अलविदा कहते हुए बोला ” तुम्हारे आखरी समय में मैं तुम्हारे साथ था ये मेरा सौभाग्य हैं। बीते 47 साल हमने 5 6 दिनों में खूब याद करें। माफ़ करना तुम्हे धोखे में रखा कि तुम ठीक हो रहीं हो।” और वह दिन रविवार सब कुछ शून्य होगया । सत्यवान की सावित्री स्वर्ग सिधार गई।

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