Story of Kashmir in Hindi

Story of Kashmir in Hindi || कश्मीर की कहानी – जानिए कश्मीर का सुनहरा इतिहास। अनदेखे की खोज करें और गर्व महसूस करें। भारत के गौरव की विविधता में एकता सीखो

भारत माता के मुकुट कश्मीर का गौरवशाली अतीत

कश्यप निर्मित कश्मीर

नीलमत पुराण में वर्णित कथा के अनुसार भारत का प्रायः सारा क्षेत्र एक भयानक जलप्रलय के परिणामस्वरूप पानी से भर गया। कालान्तर में भारत के सभी क्षेत्र पानी निकल जाने के कारण मानव के जीवनयापन के योग्य हो गए और वहाँ सारी सामाजिक व्यवस्थाएँ स्थापित हो गईं। परन्तु भारत के उत्तर में हिमालय की गोद में एक विशाल क्षेत्र अभी भी जलमग्न ही था। इस अथाह जल ने एक बहुत बड़ी झील का सा रूप बना लिया। बाद में इस झील में ज्वालामुखी फटने जैसी क्रिया हुई। झील के किनारे वाली पर्वतीय चोटियों में अनेक दरारें पड़ने से झील का पानी बाहर निकल गया। एक सुन्दर स्थान उभर कर सामने आया। क्योंकि यह स्थान (देश) अग्नि की शक्ति (ज्वालामुखी विस्फोट) से बना और अग्नि की शक्ति पौराणिक मतानुसार ‘सती’ है, इसलिए तत्कालीन भूमि विशेषज्ञों ने इस स्थान का नाम ‘सतीदेश’ रखा।

इसके पश्चात् कश्यप मुनि ने इस भू-खंड को लोगों के निवास योग्य बनाने का निश्चय करके अपने ‘श्रमिक दलबल’ के साथ पर्वतों की कटाई एवं भूमि का समतलीकरण प्रारम्भ कर दिया। सारा कार्य सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया, परन्तु पानी को स्थायी रूप से बहने का मार्ग देने के लिए एक नदी की आवश्यकता थी। कश्यप ने शंकर से सहायता माँगी। शंकर ने तुरन्त नदी बनाने के लिए विशेषज्ञों के दलों को भेजा। कश्यप ने खुदाई का उद्घाटन करने के लिए शंकर से ही आग्रह किया। शंकर ने अपने त्रिशूल से धरती में पहली चोट करके एक वितस्ति (बालिश्त) जितनी भूमि खोदकर खुदाई अभियान प्रारम्भ किया। वितस्ति जितने स्थान से निकलने के कारण इस नदी का नाम ‘वितस्ता’ पड़ा।

Story of Kashmir in Hindi

इस नदी ने पत्थरों की बड़ी-बड़ी शिलाओं को हटाकर, तोड़कर अपना मार्ग स्वयं प्रशस्त किया और अनेक क्षेत्रों की प्यास बुझाती हुई एवं कृषि भूमि को उपजाऊ बनाती हुई यह सिन्धु नदी में जा मिली।

जब यह क्षेत्र पूर्णरूप से समतल हो गया और वितस्ता नदी के घाट इत्यादि बनकर तैयार हो गए तब कश्यप मुनि ने भारत के अन्य क्षेत्रों से लोगों को यहाँ आकर बसने का विधिवत् निमन्त्रण भेजा। उनके निमन्त्रण को शिरोधार्य करते हुए भारत के कोने-कोने से सभी वर्गों एवं जातियों के लोग उद्योगपति, कृषक, श्रमिक, वैद्य, गृह एवं मार्ग शिल्पी आदि पहुँचे। सभी ने भूमि आरक्षण के लिए प्रयास प्रारम्भ किए। योग्यतानुसार, नियमानुसार एवं क्रमानुसार कश्यप मुनि के ऋषिमंडल ने सबको भूमि आवंटित कर दी। कश्यप की नाग जाति एवं अन्य वर्गों के लोगों ने नगर ग्राम बसाए और देखते ही देखते सुन्दर घर, मन्दिर आदि बन गए।

यह सारा कार्य सम्पन्न हो जाने के बाद अब प्रश्न खड़ा हुआ कि इस प्रदेश का शासन किसे सौंपा जाए तो जनता ने सर्वसम्मति से कश्यप के पुत्र नील को राजा घोषित कर दिया। इस प्रकार नील कश्मीर के प्रथम राजा हुए। उन्होंने बड़ी कुशलता से प्रदेश का शासन सम्भाला। प्रदेश के मनोरम सौन्दर्य के समाचारों ने अनेक लोगों को यहाँ आकर रहने को आकर्षित किया। भिन्न-भिन्न जातियों, धर्मों के लोग यहाँ आकर रहने लगे। राजा नील ने सबका स्वागत किया और उन्हें अनेक प्रकार की सुविधाएँ प्रदान कीं। चारों ओर शान्ति थी।

इस कश्मीर घाटी में अनेक मत-पंथ जन्मे और फूले। अनेक बार क्रान्तियां भी हुई। परन्तु यह क्रान्तियां पश्चिम की रक्तिम क्रान्तियों से भिन्न थीं। पश्चिम में क्रान्ति का अर्थ मारकाट द्वारा वर्तमान व्यवस्था को उखाड़कर नई व्यवस्था को जबरदस्ती थोप देना है। परन्तु भारत में क्रान्ति का अर्थ उस परिवर्तन से है जिससे किसी का अस्तित्व समाप्त न हो, उसमें वृद्धि हो, उसका विकास हो। नए एवं पुराने के समन्वय के साथ किया गया परिवर्तन किसी संघर्ष को जन्म नहीं देता। ‘सब मतों का आदर’ यही वह भारतीय जीवन मूल्य है जिसे कश्मीर की सीमाओं में कश्मीरियत कहा गया है।

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नागपूजा मत

कश्मीर घाटी में इस प्रकार के परिवर्तन अनेक बार हुए परन्तु कभी भी अपना मत थोपने की वृत्ति नहीं पनप सकी। इन मतों में परस्पर संघर्ष कभी नहीं हुआ। सर्वप्रथम कश्मीर में नीलमुनि द्वारा नागपूजा पर आधारित दर्शन का विकास हुआ। पूजा का यह मार्ग निर्वाध गति से चला।

बौद्ध मत

सम्राट अशोक के समय (ईसापूर्व की तीसरी शताब्दी के मध्य) कश्मीर में बौद्ध मत का प्रवेश हुआ। त्याग में सुख है, भौतिक सुख सच्चाई नहीं है, सुख लिप्सा का अन्त नहीं और अहिंसा सर्वश्रेष्ठ मार्ग है जैसे बौद्ध सिद्धान्तों का प्रचार हुआ। अशोक के समय में अनेक बौद्ध विहारों, मठ-मन्दिरों का निर्माण हुआ। विश्व के अनेक देशों में कश्मीरी बौद्ध भिक्षु मानवता की प्यास बुझाने गए। कश्मीर में बौद्ध धर्म फैला, परन्तु ब्राह्मण उससे अप्रभावित रहे और उन्होंने अपने जटिल कर्मकाण्ड की पवित्रता बनाए रखी। ब्राह्मणों का समर्थन प्राप्त करने के लिए अशोक भी प्राचीन शिवालयों में पूजा करने जाता था।

शैव मत

कश्मीर शैवदर्शन का उद्गम स्थान है। कश्मीर का 80 प्रतिशत हिंदू समाज शिव का ही उपासक है। शैवदर्शन कश्मीरी जीवन की आत्मा है। कर्मफल पर आधारित शैव दर्शन, योग और त्याग को मानव जीवन के आधारस्तम्भ मानता है, आत्मा को शाश्वत मानता है। शरीर माया प्रेरित कर्म करता है और माया के नाश से मुक्ति मिलती है। संक्षेप में यही शैव दर्शन है। शिव की कल्पना गृहस्थ रूप में की गई है। शिव का परिवार है— पत्नी पार्वती है, पुत्र कार्तिकेय एवं गणेश हैं। कार्तिकेय युद्ध के देवता हैं। गणेश गणतन्त्र के अध्यक्ष हैं। कृषि का आधार वृषभ उनका वाहन है। कृषि का जीवन जल उनके मस्तिष्क पर गंगाजल के रूप में विद्यमान है। उनका ध्यानस्थ योगीतुल्य पद्मासन जगत् में रहते हुए भी जगत से परे है। ध्यान में लीन है।

कश्मीर की धरती पर जन्मे और विकसित हुए इस शैव दर्शन में क्या नहीं है ? मानव के सम्पूर्ण जीवन की कल्पना है, उसकी उन्नति का मार्ग है। शिव के स्वरूप में घर-गृहस्थी, कृषि, धर्मयुद्ध, गणतन्त्र, योग, आत्मिक विकास, असंग्रह (त्याग) शस्त्र विद्या और समन्वय जैसे विषय और क्षेत्र समा गए हैं। विश्व में अन्यत्र कहाँ है ऐसा वैज्ञानिक दर्शन ? इसी दर्शन को जानने के लिए संसार के प्रत्येक कोने से लोग कश्मीर आते रहे।

शिक्षा का केन्द्र

श्री आनंद कौल अपनी पुस्तक ‘द कश्मीरी पंडित’ में लिखते हैं ‘भारत भर में पुरातनकाल से ही काशी और कश्मीर शिक्षा के लिए विख्यात थे। परन्तु कश्मीर काशी से आगे निकल गया। काशी के विद्वानों को अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए कश्मीर आना पड़ता था। आज भी काशी के लोग बच्चों को अक्षर ज्ञान समारोह के समय पवित्र जनेऊ सहित कश्मीर दिशा की ओर सात पग चलने को कहते हैं। पवित्र धागा कश्मीर जाने और वहाँ से लौटने का प्रतीक माना जाता है। कश्मीर की भूमि भारतीय संस्कृति की उद्गमस्थली रही है। पूरे विश्व में फैली भारतीय जीवन पद्धति के प्रचार-प्रसार में कश्मीर का विशेष योगदान है। इस तथ्य से आँखें नहीं मूँदी जा सकतीं।

कश्मीर के लोग शिक्षा प्रेमी और सुसंस्कृत हैं। कश्मीर में शिक्षा के लिए शताब्दियों से आदर और प्रतिष्ठा रही है। अल्बी, जिसने 1102 ई. में महमूद गजनवी के साथ पंजाब का भ्रमण किया था, लिखता है- “कश्मीर हिंदू-विद्वानों की सबसे बड़ी पाठशाला है। दूरस्थ और निकटस्थ देशों के लोग यहाँ संस्कृत सीखने आते थे और उनमें से अनेक लोग कश्मीर घाटी की जलवायु व प्राकृतिक छटा से चमत्कृत होकर यहाँ के हो जाते थे।”

कश्मीर घाटी में श्रीनगर से कुछ ही दूरी पर एक विशाल संस्कृत महाविद्यालय पंडित पुरुषोत्तम कौल के मार्गदर्शन एवं प्रधानाचार्यत्व में अनेक वर्षों तक चला। इस विद्यालय में भारत एवं विश्व के कोने-कोने से छात्र संस्कृत पढ़ने आते थे। यह विद्यालय पूर्णतया निःशुल्क था। भारतीय संस्कृति के विद्यादान के पक्ष की उजागर करने वाला यह उदाहरण अतुलनीय है। श्री गुरुनानक देव जी के पुत्र और उदासी पंथ के संस्थापक बाबा श्रीचंद ने भी इस महाविद्यालय में प्रशिक्षण प्राप्त किया था। मुगल राजकुमार मुहम्मद दारा शिकोह भी कश्मीर में संस्कृत पढ़ने आया था।

सभी कश्मीरी ‘पंडित’ ही क्यों?

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है कि यदि कश्मीर में सभी क्षेत्रों और वर्गों के लोग आकर बसे तो फिर सभी कश्मीरी पंडित ही क्यों ? इस गहरे प्रश्न का उत्तर कश्मीर की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत और यहाँ की जातीय पहचान के साथ जुड़ा हुआ है। प्रारम्भ से ही कश्मीर विद्वानों की भूमि के नाम से प्रसिद्ध है। ऋषियों, मुनियों, मठों-मन्दिरों, विद्यापीठों और आध्यात्मिक केन्द्रों की इस भूमि ने दिग्विजयी विद्वान उत्पन्न किए हैं। ये सब विद्वान पंडित कहलाए। ज्ञान रखने वाला और बाँटने वाला ‘पंडित’ होता है। अतः ज्ञान की भूमि कश्मीर की जातीय पहचान ही ‘पंडित’ नाम से प्रसिद्ध हो गई। गंगा की पवित्र धारा में जो भी छोटे-बड़े नदी नाले मिले, वे गंगा ही हो गए। ‘कश्मीरी’ और ‘पंडित’ दोनों एकाकार होकर समानार्थी बन गए।

‘कश्मीरियत’ का यह भी एक अति उज्ज्वल और प्रेरणास्पद पक्ष है कि इस धरती ने जाति, बिरादरी इत्यादि बातों को गौण मानकर सभी को एकरस कर दिया। छोटे-बड़े, वनवासी, नगरवासी, पिछड़े इत्यादि सबको विद्वान ‘पंडित’ बनने का अधिकार दिया है कश्मीर की धरती ने। इसीलिए यह भूमि ‘स्वर्ग’ है। अन्यथा तो कश्मीर में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चारों वर्णों के लोग थे और आज भी हैं। कश्मीर में प्राचीनकाल से क्षत्रिय वंश यहाँ का प्रभावशाली और शासक वर्ग रहा है।

जिस तरह से शेष भारत में क्षत्रिय लोग अपने नाम के साथ ‘सिंह’ शब्द जोड़ते हैं, कश्मीर के क्षत्रिय अपने नाम के साथ आदित्य’ शब्द जोड़ते थे। प्रतापादित्य ललितादित्य, वज्रादित्य, बालादित्य, रणादित्य, वेदादित्य और विक्रमादित्य इत्यादि। आदित्य सूर्य का सम्बोधन है, अतः यह वंश सूर्यवंशी क्षत्रिय था। क्षत्रियों के अन्य भी अनेक वंश आज भी कश्मीर में हैं। भले ही वे भय और स्वार्थवश आज पन्थांतरित हो गए हैं परन्तु अधिकांश आज भी अपने नाम के साथ अपना वास्तविक वंश और गोत्र लिखना नहीं भूले। लोहर, डामर, राठौर, नायक, ठाकुर इत्यादि वंश परम्पराएं प्रचलित हैं। कश्मीर घाटी के उत्तरी क्षेत्र में लोहर और दक्षिणी भाग में डामर क्षत्रिय वंशों का बाहुल्य है। कश्मीर में व्यापारी (वैश्य) वर्ग भी है। सोपुर क्षेत्र के त्र्यंबू और बोरा इसी वंश के हैं। शूद्र वर्ण से सम्बन्धित कुम्हार, चर्मकार इत्यादि वातल कहलाते थे और वे आज भी हैं।

कश्मीर के जातीय चरित्र में विद्वत्ता और क्षत्रियत्व दोनों हैं। इस भूमि का अतिप्रसिद्ध गोत्र भट्ट है। इसमें दोनों भावों का मिश्रण है। ‘भट्ट’ का अर्थ है ब्राह्मण, शिक्षक, ज्ञान बाँटने वाला और ‘भट’ जिसमें एक ‘ट’ आता है का अर्थ है सैनिक, लड़ने वाला, रक्षक अतः यह शब्द ब्राह्मण व क्षत्रिय दोनों के लिए प्रयोग में आने लगा। ‘पंडित’ शब्द उस कश्मीरियत (भारतीयता) का पर्याय मात्र है जिसने लगातार चार हजार वर्षों तक संसार के विद्वानों को आकर्षित, प्रभावित और संस्कारित किया है।

‘पंडित’ शब्द कश्मीर की विरासत है। यह शब्द कश्मीर के प्राचीन इतिहास, संस्कृत वाङ्मय, पर्वतों, नदियों, हरी वादियों, शीतल घाटियों- इन सबका स्मृति मंदिर है, कश्मीर के प्राचीन वैभव का प्रतीक है, प्रमाण है। इस सम्बन्ध में डॉ. त्रिलोकीनाथ गंजू ने अपनी पुस्तक ‘महार्षि शिर्यभट्ट’ में लिखा है-‘” जो भी कश्मीरी हिंदू अब मुसलमानों के मारकाट और बलातू धर्मपरिवर्तन से बाकी बचे थे, उनमें एक ही वर्ण नहीं था। वास्तव में उनमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र भी थे। इनकी संख्या इतनी कम थी कि व्यवस्थित वर्ण व्यवस्था को अपनाकर समाजशास्त्रीय व्यावहारिकता को निभाना दुष्कर था।

ऐसी स्थिति में महार्षि शिर्यभट्ट ने तत्कालीन जनमानस को एक नयीन वर्णहीन (Classless) समाज के निर्माण के लिए अनुप्रेरित किया। किन्तु वर्ण एक ऐसा निगूढ़ सामाजिक अन्तः स्थूल संस्कार रहा है कि इसका वर्णन संभव नहीं हो सका है। इस कारण शिर्यभट्ट ने सभी कश्मीरी हिन्दुओं को ब्राह्मण वर्ण में दीक्षित करके एक ही वर्णव्यवस्था अपनाई है। इस तत्कालीन योजना का सारा रहस्य कश्मीरी गोत्रों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है। जिस ओर अभी तक किसी भी इतिहासकार का ध्यान “नहीं गया है।”

नदी पर्वतों के नाम क्या बताते हैं?

आज भले ही कश्मीर और कश्मीरियत पर विदेशी और विधर्मी रंग चढ़ाकर उसके प्राचीन और वास्तविक दैदीप्यमान स्वरूप को क्षतविक्षत करने का प्रयास किया जा रहा है परन्तु यह बात भगवान भास्कर के प्रकाश की तरह साफ है कि कश्मीर कभी हिंदू ही था। कश्मीरियत कभी हिंदू संस्कृति ही थी। आज जो इस सांस्कृतिक धरोहर को समाप्त करने हेतु विदेशी और विधर्मी षड्यन्त्रों के शिकंजे में आ चुके हैं, वे बरखुरदार भी हिंदू पूर्वजों की ही सन्ताने हैं।

सुदूर उत्तर में कश्मीर घाटी का सिरमौर है हिन्दुकुश पर्वत। नाम से ही पता चलता है इसकी धरोहर का क्रान्तिकारी देशभक्त अश्फाकउल्ला खां ने भावुक होकर कहा था “मेरा हिन्दु कुश हुआ हिन्दुकश” (हिन्दुकश अर्थात् हिंदू की हत्या करने वाला) । फिर इस हिंदूकुश से प्रारम्भ होती है कश्मीर की पर्वत श्रृंखला। ब्रह्म शिखर, हरमुकुट पर्वत, महादेव पर्वत, गोपाड़ि पर्वत, चंदनवन, नौबन्धन, नागपर्वत सभी संस्कृत नाम हैं।

कश्मीर को सतीसार का नाम देवताओं ने ही दिया था। सतीसार पर राज्य करने वाला नीलनाग कश्मीर को बसाने वाले कश्यप ऋषि का पुत्र ही तो था। कल्हण अपनी राजतरंगिणी में सिन्धु नदी को उत्तर गंगा का नाम देते हैं। तो नीलमत पुराण में इसी को ‘उत्तरमानस’ अर्थात् गंगबल बताया गया है। इसी के नजदीक पड़ता है प्राचीन तीर्थस्थल नन्दी क्षेत्र आज यही नंदकोट कहलाता है।

पास में ही कनकवाहिनी नदी का प्रवाह है जो अब विकृत नाम ‘कनकई नदी’ धारण कर चुका है। झेलम ही वैदिक वितस्ता है। कृष्ण गंगा के किनारे स्थित है शारदा तीर्थ अन्य तीर्थों के नाम हैं-अमरेश्वर (प्रसिद्ध अमरनाथ), सुरेश्वर, त्रिपुरेश्वर, हर्षेश्वर, ज्येष्ठेश्वर, शिवभूतेश्वर, शारदा तीर्थ, सरित्शिला। ये नाम किस धर्म दर्शन से जुड़े हुए हैं? और कश्मीर के ही ये दरें देखिए, जिनके नाम हैं सिद्ध पथ (आज) का बुडिल या सीडन दर्रा), पंचाल धर (पीर पंजाल), दुग्धधर (दुदुकंत), जोजीला दर्रा, चिन्तापानी आदि। ये नाम किस इतिहास की ओर इशारा करते हैं? तभी तो अंग्रेज़ इतिहासकार वर्नियर ने माना कि कश्मीर का नाम कश्यप ऋषि से जुड़ा है।

मुस्लिम लेखक मलिक हैदर ने भी स्पष्ट लिखा है कि कश्मीर को बसाने वाले कश्यप ऋषि ही थे। राजतरंगिणी कश्मीर की धरती पर रचा गया विश्व प्रसिद्ध संस्कृत ग्रंथ राजतंगिणी चार हजार से भी अधिक वर्षों का प्रामाणिक इतिहास प्रस्तुत करता है। इसके रचनाकारों के समक्ष कश्मीर का सारा घटनाक्रम चला। यह भी अपने आप में एक विश्व कीर्तिमान है कि कोई एक ही ग्रन्थ शताब्दियों तक एक के बाद एक, अनेक रचनाकारों ने लिखा हो।

कल्हण, जोनराज, श्रीवर और शुक ने अपने समय में इस ग्रन्थ को आगे बढ़ाया। इस ऐतिहासिक ग्रन्थ में बौद्ध, शैव, वैष्णव, पिशाच, नाग, गुहक, भोट्ट, शिया, सुन्नी, सैय्यद, चक्र, मुगल, पठान, सिख, डोगरा, ईसाई एवं कश्मीरी जनता का अद्भुत योगदान है। सभी दर्शनों से प्रभावित शासन पद्धतियों द्वारा कश्मीर का शासन हुआ है। परस्पर विरोधी तन्त्रों, परस्पर विरोधी दर्शनों परस्पर विरोधी मत-मतान्तरों के विश्लेषणात्मक अध्ययन के लिए कश्मीर एक पूर्ण सज्जित प्रयोगशाला है।

सती देश

कश्मीर में आज जितने भी भवनों के खण्डहर मिलते हैं वे सब देवस्थानों, पाठशालाओं, मठों, विहारों के ही ध्वंसावशेष हैं। परन्तु राजाओं के आमोद-प्रमोद और व्यक्तिगत विलास हेतु राजप्रासाद, राजभवन और स्त्रियों के हरम कहीं दृष्टिगोचर नहीं होते। हिंदू राजाओं ने अपने सुख के लिए जनता के सुख का कभी अपहरण नहीं किया। कश्मीर के राजाओं, सन्तों, महात्माओं ने क्योंकि इस भूमि को सती देश माना, इसलिए कश्मीरी प्रजा को कष्ट देने का अर्थ भगवती सती को अपमानित करना माना गया।

कश्मीर के राजाओं ने भारत की दिग्विजय परम्परा को सुरक्षित रखा और आगे भी बढ़ाया। परन्तु जिस भी प्रदेश को जीता उसकी सत्ता वहीं के स्थानीय लोगों को सौंप दी। अपने उपनिवेश स्थापित नहीं किए। वहाँ की जीवन प्रणाली को नष्ट नहीं किया, देवस्थान नहीं तोड़े, धर्म परिवर्तित नहीं किया अपना तन्त्र किसी पर जबरदस्ती थोपा नहीं। सम्राट ललितादित्य ने मध्य एशिया तक का प्रदेश जीता परन्तु अपने जीवन को विलासमय नहीं बनने दिया।

कश्मीर ने सम्राट मेघवाहन जैसे दिग्वियी सम्राट उत्पन्न किए, जिसकी सैनिक वाहिनियों ने आधे विश्व को विजय किया। उन्होंने विजित प्रदेशों को एक शर्त पर वापस किया कि वहाँ प्राणी हिंसा नहीं होगी। वह जीवधारियों को जीवन का अभयदान देकर वापस लौटा। प्राणी रक्षा हेतु स्वयं बलि को प्रस्तुत होने वाला मेघवाहन अपने आदर्श से कश्मीर को ऊँचा उठा गया।

सूफी मत

चौदहवीं शताब्दी के आगमन के साथ कश्मीर की धरती पर सूफी मत का आगमन भी हुआ। हमदान (फारस) के एक सूफी संत सैय्यद अली हमदानी सन् 1372 में अपने 700 शिष्यों के साथ कश्मीर आए। बाद में अनेक सूफी संत कश्मीर में आए। यद्यपि ये सूफी संत कश्मीर के लोगों को इस्लाम में धर्मान्तरित करने के एकमात्र उद्देश्य से आए थे और अपने उद्देश्य में सफल भी रहे तथापि इनके आध्यात्मिक उपदेशों को कश्मीर की जनता ने विशाल फुलवाड़ी में एक और पुष्प के रूप में स्वीकार किया। मानव जीवन में भक्ति, सरलता, संयम, पवित्रता इत्यादि गुण इस सूफीमत के मार्गदर्शक गुण माने जाते हैं। सूफीमत के अनुसार जिहाद का अर्थ होता है भौतिक इच्छाओं पर नियन्त्रण करके अपने अन्दर की बुराइयों को दूर हटाना उनके विरुद्ध लड़ना।

सूफीमत के उपरोक्त सिद्धान्त कितने व्यावहारिक हैं? कश्मीर की जनता ने इन सूफी सन्तों को अपने महापुरुषों की श्रेणी में स्थान दिया और इनके उपदेशों को कश्मीरियत का हिस्सा बना लिया। यह अलग बात है कि सूफी सन्तों ने हिंदू समाज का जो धर्मान्तरण इस्लाम में किया वही आज कश्मीरियत पर उभरे कैंसर के फोड़े के रूप में रिस रहा है।

ऋषि मत

चौदहवीं शताब्दी के ही मध्यकाल में कश्मीर में ‘ऋषि परंपरा’ अथवा व्यवस्था का जन्म हुआ। संन्यासिनी लालदे और शेख नूरुद्दीन के उपदेशों और प्रयासों से यह आध्यात्मिक संगठन बना। इन ऋषियों की संख्या दो हज़ार के लगभग थी और ये गाँव-गाँव में फैले हुए थे। अबुल फजल नामक एक मुस्लिम संत, जो बाद में ‘ऋषि व्यवस्था’ के अंग बन गए, ने कहा है-“कश्मीर में सर्वाधिक आदरणीय वर्ग ऋषियों का है। हालांकि उन्होंने पूजा के परम्परागत रीति-रिवाजों को नहीं त्यागा है, फिर भी वे सच्चे भक्त हैं। वे दुनिया की वस्तुओं की इच्छा नहीं रखते। लोगों के फायदे के लिए वे फलवाले वृक्ष लगाते हैं। वे माँस नहीं खाते और विवाह नहीं करते। इन ऋषियों ने कश्मीर की भूमि को वास्तव में स्वर्ग बना दिया।

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